नदी थी एक बड़ी,
वहाँ रहती थी हिरणों की एक गढ़ी,
वन वासी रखते थे वहाँ नज़र कड़ी,
तभी वहाँ एक मुसीबत आ पड़ी |
शेरों का एक बड़ा झुंड वहाँ आया,
हिरणों को बहुत डराया |
बरसात होने लगी टिप-टिप
लोग गए अपने घर में छिप |
हिरणों का था वहाँ कोई नहीं,
डर था शेर न कर दें हमला कहीं |
तभी वहाँ के बाघों का झुंड आया,
शेरों को समझाया |
शेरों ने उनकी बात न मानी,
युद्ध की सूचना की जारी |
हिरण बाघों के पीछे थे खड़े,
शेर थे अपनी जिद पे अड़े |
शेरों ने पहला वार किया,
बाघों को सहमा दिया |
पर बाघ हटे नहीं पीछे,
उन्होंने नहीं किया सिर नीचे |
बाघों ने भी किया वार,
एक शेर को दिया मार |
शेर गए बौखला,
बना के रखा हौसला |
एक बाघ को मार गिराया,
सबको अपना दम दिखाया |
बाघों ने भी किया आक्रमण,
एक शेर को लिया पकड़ |
शेर वहाँ से भाग पड़े,
बाघ थे अपने इलाके में खड़े |
हिरणों ने किया बाघों का सम्मान,
लोग भी नहीं कर पाये उनका अपमान |
फिर वहाँ से चले गए बाघ,
छोड़ अपने खून के निशान |
उस ही दिन लिया वन वासी और हिरणों ने सोच,
अगली बार करेंगे इलाके की रक्षा बिना किये संकोच |
– अनमोल अग्रवाल
(2017)